निरस्त धारा में आदेश देना निगम अधिकारी को भारी पड़ गया है हाईकोर्ट ने निगम अफसर पर 1 लाख जुर्माना लगाया है। इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निरस्त धाराओं के आधार पर आदेश जारी करना गंभीर लापरवाही है।

हाई कोर्ट ने निगम के आदेश को खारिज किया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने मेसर्स बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने नगर निगम द्वारा जारी 30 सितंबर 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पुराने और हटाए गए कानून के तहत ₹1.60 करोड़ की वसूली का दावा किया गया था।

अदालत ने इस आदेश को अवैध बताते हुए निगम के जिम्मेदार अधिकारी पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। न्यायमूर्ति संदीप नटवरलाल भट्ट की पीठ ने कहा कि यह आदेश अधिकारी की अज्ञानता और लापरवाही का परिणाम है।

इंदौर हाई कोर्ट ने हटाई धाराओं में आदेश दिया और निगम अफसर पर 1 लाख जुर्माना लगाया

जुर्माने की राशि अधिकारी की व्यक्तिगत जेब से वसूली जाएगी

कोर्ट ने इस मामले में यह भी निर्देश दिया कि 1 लाख रुपये का जुर्माना संबंधित अधिकारी के व्यक्तिगत वेतन या जेब से वसूला जाएगा। इससे सरकारी खजाने पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।

यह कदम अधिकारियों को कानून के प्रति सजग रहने और गैरकानूनी आदेश जारी करने से रोकने के लिए उठाया गया है। कोर्ट ने कहा कि वैधानिक संस्थाओं को कानून के दायरे में काम करना चाहिए, ताकि आम जनता को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद

यह विवाद गंगवाल बस स्टैंड के पास बाफना हॉस्पिटल के खिलाफ वर्ष 2020 में हटाई जा चुकी धाराओं के तहत वसूली के आदेश को लेकर था। नगर निगम ने अस्पताल पर ₹1.60 करोड़ की रिकवरी का नोटिस जारी किया और भवन को कुर्क/सील करने का भी आदेश दिया।

अस्पताल प्रबंधन ने इस कार्रवाई को चुनौती दी और हाई कोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान निगम ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए विवादित आदेश और लेखा रिपोर्ट वापस ले ली।

कोर्ट ने निगम की लापरवाही पर जताई कड़ी नाराजगी

हाई कोर्ट ने कहा कि रद्द धाराओं के आधार पर आदेश पारित करना निगम अधिकारी की घोर लापरवाही है। इससे याचिकाकर्ता को अनावश्यक परेशानी हुई और कोर्ट का समय भी बर्बाद हुआ।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नगरपालिका जैसी संस्था को कानून का सम्मान करना चाहिए और केवल वैध आदेश ही पारित करने चाहिए।

अधिवक्ताओं ने पेश की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल और जयेश गुरनानी ने निगम के अवैध आदेशों पर आपत्ति जताई। निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज मुंशी और शशांक श्रीवास्तव ने मामले की पैरवी की।

सुनवाई के दौरान निगम ने गलती मानते हुए आदेश वापस लेने की पेशकश की, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया।

आम जनता पर प्रभाव और भविष्य की कार्रवाई

यह फैसला नगर निगम जैसे संस्थानों को कानूनी प्रक्रिया का पालन करने का संदेश देता है। इससे आम जनता को गलत और अवैध वसूली से सुरक्षा मिलेगी।

साथ ही अधिकारियों को सावधानी बरतने और गैरकानूनी आदेश जारी न करने की चेतावनी भी मिली है। भविष्य में ऐसे आदेशों पर कोर्ट कड़ी निगरानी रखेगा।


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