इजरायली चुनाव में नेतन्याहू का गठबंधन 53 सीटों पर सिमट गया है, जो बहुमत के आंकड़े से दूर है। 27 अक्टूबर 2026 को हुए इस चुनाव में कुल 77.7% मतदान दर्ज हुआ, लेकिन किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों का बहुमत हासिल नहीं हो पाया।
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी बनी सबसे बड़ी पार्टी
इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने 26 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है। हालांकि, उनके नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबंधन को कुल 53 सीटें मिली हैं, जो बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों से आठ सीटें कम है।
इस स्थिति ने नेतन्याहू की सरकार बनाने की संभावनाओं को जटिल बना दिया है।

विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलीं
पूर्व सेना प्रमुख गादी आइज़ेनकोट की ‘याशर’ पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को कुल 48 सीटें मिली हैं। यह आंकड़ा भी बहुमत से काफी कम है, जिससे विपक्ष के लिए भी अकेले सरकार बनाना संभव नहीं दिख रहा है।
फिलहाल दोनों मुख्य राजनीतिक खेमे त्रिशंकु स्थिति में फंसे हुए हैं।
अरब पार्टियों का अभूतपूर्व प्रदर्शन
इस चुनाव में दो मुख्य अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों, जॉइंट लिस्ट और राम, ने संयुक्त रूप से कुल 19 सीटें हासिल कीं। यह इजरायली चुनावों में उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ये पार्टियां अब किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं क्योंकि उनके समर्थन के बिना कोई भी गठबंधन बहुमत नहीं जुटा सकता।

मतगणना में बचे हुए वोट और संभावित बदलाव
लगभग 93 प्रतिशत वोटों की गिनती के बाद भी लगभग 5 लाख ‘डबल एनवेलप’ वोटों की गिनती बाकी है। ये वोट मुख्य रूप से इजरायली सैनिकों, राजनयिकों और कैदियों के हैं।
इन वोटों की गिनती से सीटों के समीकरण में मामूली बदलाव संभव है, लेकिन राजनीतिक गतिरोध बरकरार रहने की संभावना अधिक है।
राष्ट्रपति की भूमिका और सरकार गठन की प्रक्रिया
राज्यपाल इसहाक हर्ज़ोग अब सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं से विचार-विमर्श करेंगे। इसके बाद वह किसी एक नेता को सरकार बनाने का जनादेश देंगे। यह प्रक्रिया जटिल गठबंधन वार्ता के दौर की शुरुआत होगी।
राजनीतिक दलों को सहयोग और समझौते के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी ताकि स्थिर सरकार का गठन हो सके।
इजरायली जनता पर चुनाव परिणाम का असर
इस चुनावी परिणाम से इजरायली जनता के लिए अस्थिर राजनीतिक माहौल की संभावना बढ़ गई है। लंबे समय तक चलने वाली गठबंधन वार्ताएं सामाजिक-आर्थिक नीतियों पर असर डाल सकती हैं।
विशेष रूप से गरीब और अल्पसंख्यक वर्गों की उम्मीदें इस त्रिशंकु संसद में गठबंधन के आधार पर टिकी हैं।
