NGT की संयुक्त समिति की रिपोर्ट में रेत माफियाओं से जुड़े अफसरों पर सवाल खड़े हो गए हैं। मध्य प्रदेश के सिंध नदी के तटों पर अवैध रेत खनन की जांच में यह तथ्य सामने आया है कि स्थानीय प्रशासन और खनन अधिकारी अवैध कार्यों को रोकने में विफल रहे हैं।
NGT की संयुक्त समिति ने टास्क फोर्स की कार्यप्रणाली को बताया अप्रभावी
एनजीटी द्वारा गठित संयुक्त समिति ने पाया कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अवैध रेत उत्खनन को रोकने के लिए बनाए गए टास्क फोर्स ने ज़मीनी स्तर पर कोई सार्थक प्रभाव नहीं डाला। इसके कारण अवैध खनन में निरंतर वृद्धि हुई है। टास्क फोर्स की नाकामी ने पर्यावरण और नदी तटों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
अफसरों और रेत माफियाओं के बीच मिलीभगत का शक
रिपोर्ट में यह भी चिंता व्यक्त की गई है कि स्थानीय प्रशासनिक और खनन अधिकारियों के बीच अवैध रेत माफिया के साथ गुप्त सांठगांठ हो सकती है। इस वजह से बड़े अवैध रेत भंडारों पर कार्रवाई में जानबूझकर ढिलाई बरती जा रही है, जबकि छोटे स्टॉकपाइल्स को निशाना बनाया जाता है।
प्रतिबंधित इलाकों में भी जारी अवैध खनन
मध्य प्रदेश के दतिया जिले में पुल के पास स्थित प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी अवैध रेत उत्खनन के प्रमाण मिले हैं। यह स्थिति पर्यावरण सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है और नदी के पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ रही है। प्रतिबंधित क्षेत्रों में खनन प्रतिबंध के बावजूद यह गतिविधियां अनियंत्रित रूप से हो रही हैं।
सुरक्षा और जांच चौकियों की कमी से अवैध परिवहन बढ़ा
रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ कि नदी के किनारे आवश्यक चेक पोस्ट या सुरक्षा चौकियां या तो नहीं हैं या निष्क्रिय हैं। इस कमी के कारण अवैध रेत का परिवहन बेधड़क हो रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है बल्कि कानून व्यवस्था भी कमजोर हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और NGT की सख्त सिफारिशें
अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की लाचारी पर कड़ी नसीहत दी थी। कोर्ट ने अर्धसैनिक बलों की तैनाती और खनन पर पूर्ण प्रतिबंध की चेतावनी दी थी। इस पृष्ठभूमि में NGT की समिति ने नियमित निगरानी समिति बनाने, मासिक रिपोर्ट दाखिल करने और लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की सिफारिश की है।
आगे की कार्रवाई और संभावित प्रभाव
यदि रिपोर्ट की सिफारिशें लागू होती हैं, तो अवैध रेत खनन पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी। इससे सिंध नदी और उसके तटों का संरक्षण होगा। आम जनता के लिए यह सकारात्मक कदम होगा क्योंकि नदी संरक्षण से जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे और पर्यावरणीय संतुलन बना रहेगा। हालांकि, प्रशासन की गंभीरता और पारदर्शिता इस दिशा में सबसे अहम होगी।
