मध्य प्रदेश में विधायक निधि और खरीदी में गड़बड़ी के मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर हलचल मचा दी है। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस के नेता और मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने निष्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने विशेष रूप से रेट ऑफ शेड्यूल (SOR) में बढ़ोतरी से संबंधित अनियमितताओं को उजागर किया है, जिससे सरकारी धन का दुरुपयोग हो रहा है।

विधायक निधि और रेट ऑफ शेड्यूल में गड़बड़ी का आरोप

उमंग सिंघार के अनुसार, रेट ऑफ शेड्यूल (SOR) को अधिकारियों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर तय किया जाता है। इसके कारण विधायक निधि के अंतर्गत स्वीकृत कामों की लागत बढ़ जाती है, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान होता है। वे कहते हैं कि यदि दरें औसत बाजार दरों के अनुरूप होतीं तो बचत हो सकती थी।

यह मुद्दा खासकर तब सामने आया है जब नगरीय निकायों की खरीदी की जांच की गई।

मध्य प्रदेश में विधायक निधि और खरीदी में गड़बड़ी का मुद्दा

नगरीय निकायों की खरीदी में ₹1,134 करोड़ से ज्यादा का आंकड़ा

पिछले तीन वर्षों में प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने GeM पोर्टल के माध्यम से लगभग ₹1,134 करोड़ की खरीदी की है। उमंग सिंघार का दावा है कि इस राशि में भारी अनियमितताएं हैं। वे मानते हैं कि अगर खरीदी औसत बाजार दरों पर होती तो लगभग ₹250 करोड़ तक की बचत संभव थी।

इस प्रकार की बड़ी खरीदारी में दरों में अंतर सीधे सरकारी धन की बर्बादी को दर्शाता है।

खरीदी में दरों के अंतर के स्पष्ट उदाहरण

उदाहरण के तौर पर, एक ही प्रकार के कचरा वाहन अलग-अलग नगर निकायों ने ₹2 लाख से ₹6 लाख की अलग-अलग कीमतों पर खरीदे। इसी तरह, एक नगरीय निकाय ने ₹60 लाख की लागत में 200 एलईडी बल्ब खरीदे।

इसके अलावा, फिनाइल और पानी के टैंकरों की दरों में भी असमानता देखी गई है, जो बाजार दरों से कहीं अधिक बताई गई है।

उमंग सिंघार की मुख्यमंत्री से जांच और कार्रवाई की मांग

उमंग सिंघार ने प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की अपील की है। वे चाहते हैं कि रेट ऑफ शेड्यूल (SOR) की दरों को कम किया जाए और जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी में वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

उनका मानना है कि इससे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण मिलेगा और सरकारी धन का सही उपयोग सुनिश्चित होगा।

मध्य प्रदेश के आम नागरिकों पर इसका प्रभाव

विधायक निधि और नगरीय निकायों में होने वाली अनियमितताएं सीधे तौर पर आम जनता को प्रभावित करती हैं। जब सरकारी खर्च में गड़बड़ी होती है, तो विकास कार्यों की गुणवत्ता और समयबद्धता पर असर पड़ता है।

नतीजतन, नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं और सेवाएं कम और महंगी मिलती हैं, जिससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है।

आगे क्या हो सकता है इस मामले में?

इस मुद्दे पर राजनीतिक दबाव के बाद सरकार से निष्पक्ष जांच की उम्मीद जताई जा रही है। जांच पूरी होने के बाद कार्रवाई के स्वरूप का सबको इंतजार रहेगा।

यदि आरोप सही पाए गए तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा और वित्तीय सुधार की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भविष्य में ऐसी गड़बड़ी रोकने में मदद मिलेगी।


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