इंदौर। डीएलएफ गार्डन सिटी के नौ व्यावसायिक भूखंडों की रजिस्ट्री में स्टांप ड्यूटी की कथित गड़बड़ी के मामले में वरिष्ठ जिला पंजीयक अमरेश नायडू, बिल्डर विवेक चुघ और उप पंजीयक संजय सिंह को इंदौर हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की युगलपीठ ने मामले में दर्ज एफआईआर निरस्त करने की मांग वाली तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि मामले में उठाए गए सवाल तथ्यात्मक विवाद से जुड़े हैं, जिनका परीक्षण साक्ष्यों और सुनवाई के दौरान किया जाना आवश्यक है। इस स्तर पर आपराधिक जांच में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार नहीं है।

13 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला केवल संपत्ति के मूल्यांकन अथवा स्टांप ड्यूटी की गणना में अंतर का नहीं रह गया है। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया है कि भूखंडों की वास्तविक स्थिति छिपाई गई, लेआउट मैप के साथ छेड़छाड़ की गई और पंजीयन अधिकारियों की कथित मिलीभगत से कम मूल्य पर दस्तावेजों का पंजीयन कराया गया। हालांकि, ये आरोप हैं, जिनकी पुष्टि जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया में होनी है।

नौ व्यावसायिक भूखंडों की रजिस्ट्री पर विवाद

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार 19 सितंबर से 1 अक्टूबर 2024 के बीच डीएलएफ गार्डन सिटी इंदौर प्राइवेट लिमिटेड की ओर से नौ व्यावसायिक भूखंडों (सी-1 से सी-9) की रजिस्ट्रियां कराई गई थीं। ये भूखंड इंदौर जिले की तहसील सांवेर के ग्राम मांगलिया सड़क क्षेत्र में एबी रोड बायपास के पास स्थित हैं। फरवरी 2025 में विजय कुमार वर्मा ने महानिरीक्षक पंजीयन के समक्ष शिकायत की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि सेवा प्रदाता और संबंधित उप पंजीयकों की मदद से भूखंडों की गाइडलाइन दर में कथित हेरफेर किया गया, जिससे कम स्टांप ड्यूटी जमा हुई और शासन को लगभग 8 से 10 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। शिकायत के बाद मामले की जांच के लिए संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गई। स्टांप कलेक्टर ने तीन उप पंजीयकों की समिति से परीक्षण कराया और भारतीय स्टांप अधिनियम के तहत कार्रवाई भी शुरू की गई। इसी दौरान आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) को एक अलग शिकायत मिली, जिसके बाद मामले की जांच शुरू हुई।

25,400 की जगह 14,200 की गाइडलाइन

आदेश में दर्ज तथ्यों के मुताबिक, इंदौर के अपर कलेक्टर ने 8 अप्रैल 2025 को प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा था कि डीएलएफ गार्डन सिटी के लिए लागू गाइडलाइन दर 25,400 रुपये प्रति वर्गमीटर थी, जबकि रजिस्ट्रियों में ग्राम मांगलिया सड़क की 14,200 रुपये प्रति वर्गमीटर की दर लागू की गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होने के कारण 100 प्रतिशत अधिक दर, यानी 50,800 रुपये प्रति वर्गमीटर लागू होनी चाहिए थी।

सरकार को 13.32 करोड़ रुपए का नुकसान

इसी मूल्यांकन के आधार पर स्टांप ड्यूटी में अंतर की गणना की गई और ईओडब्ल्यू ने एफआईआर दर्ज की। राज्य की ओर से हाईकोर्ट में बताया गया कि इन भूखंडों पर लगभग 18.71 करोड़ रुपये की स्टांप ड्यूटी देय थी, जबकि केवल 5.38 करोड़ रुपये जमा किए गए। अभियोजन के अनुसार, इससे सरकारी खजाने को लगभग 13.32 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

लेआउट मैप से छेड़छाड़ का आरोप

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि भूखंड डीएलएफ गार्डन सिटी की गेटेड कॉलोनी के भीतर नहीं थे और वहां की आंतरिक सुविधाओं तक उनकी पहुंच भी नहीं थी। इसलिए ग्राम मांगलिया सड़क की गाइडलाइन दर लागू करना गलत नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि स्टांप ड्यूटी की कमी का निर्धारण करने के लिए भारतीय स्टांप अधिनियम के तहत अलग प्रक्रिया मौजूद है और इसे आपराधिक मामला नहीं बनाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने अपर कलेक्टर की रिपोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाए। उनका तर्क था कि स्टांप ड्यूटी में कमी तय करने का अधिकार स्टांप कलेक्टर के पास है। इस संबंध में उन्होंने पूर्व न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए एफआईआर को निरस्त करने की मांग की।

लेआउट का गलत हिस्सा अपलोड किया गया

राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि भूखंड डीएलएफ गार्डन सिटी परियोजना का हिस्सा होने के बावजूद दस्तावेजों में उनकी स्थिति को अलग तरीके से दर्शाया गया। अभियोजन के अनुसार, लेआउट मैप का केवल आंशिक हिस्सा अपलोड किया गया और इस तरह संपत्ति का वास्तविक विवरण छिपाकर कम गाइडलाइन दर का लाभ लिया गया।

कोर्ट ने कहा- तथ्यों की जांच ट्रायल में होगी

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि भूखंड गेटेड कॉलोनी के भीतर आते हैं या बाहर, इसका निर्धारण भौतिक परीक्षण और साक्ष्यों के आधार पर किया जाना है। इसी तरह लेआउट मैप के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई या नहीं, यह भी साक्ष्य का विषय है। इन विवादित तथ्यों का फैसला एफआईआर निरस्त करने की याचिका पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि स्टांप अधिनियम के तहत समानांतर कार्यवाही चलने मात्र से आपराधिक अभियोजन पर रोक नहीं लगती, खासकर जब आरोपों में आपराधिक षड्यंत्र, तथ्यों को छिपाने और दस्तावेजों में कथित हेरफेर जैसे पहलू शामिल हों।

कोर्ट ने कहा-जांच रोकी नहीं जाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संज्ञेय अपराध के आरोप सामने आने पर सामान्यतः जांच को शुरुआती चरण में नहीं रोका जाना चाहिए। एफआईआर में लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया देखने पर अपराध के तत्व सामने आते हैं, इसलिए जांच को आगे बढ़ने का अवसर दिया जाना चाहिए।


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