शाजापुर में बोमा पद्धति से कृष्णमृगों के सफल रेस्क्यू ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 28 अक्टूबर 2026 को शाजापुर जिले के रंथभंवर एवं कुलमानखेड़ी क्षेत्र में इस रेस्क्यू अभियान के दूसरे चरण का निरीक्षण किया।

शाजापुर में बोमा पद्धति से कृष्णमृगों का रेस्क्यू अभियान जारी

शाजापुर जिले में बोमा पद्धति से कृष्णमृगों का रेस्क्यू 9 अक्टूबर 2026 से शुरू हुआ था। यह अभियान 31 अक्टूबर तक चलेगा। इस तकनीक में वन्यजीवों को सुरक्षित पकड़ने और फिर नए आवास तक पहुंचाने के लिए विशेष उपकरणों का उपयोग किया जाता है।

इस प्रक्रिया में हेलीकॉप्टर, बाड़े और कैमोफ्लाज्ड मचान शामिल हैं, जो वन्यजीवों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। शाजापुर में बोमा पद्धति से कृष्णमृगों का यह रेस्क्यू अभियान पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।

डॉ. मोहन यादव ने रेस्क्यू अभियान का लिया जायजा

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रंथभंवर क्षेत्र में इस अभियान के दूसरे चरण का निरीक्षण किया। उन्होंने रेस्क्यू के हर चरण को बारीकी से देखा और अधिकारियों से जानकारी ली। उनका कहना था कि इस सफल मॉडल को राज्य के अन्य जिलों में भी लागू किया जाएगा।

डॉ. यादव ने अभियान की सफलता पर संतोष व्यक्त किया और कहा कि इससे किसानों को फसल नुकसान से राहत मिलेगी। इस निरीक्षण ने रेस्क्यू अभियान की गंभीरता और प्रभावशीलता को स्पष्ट किया।

कृष्णमृगों के रेस्क्यू में बोमा पद्धति की विशेषताएं

बोमा पद्धति एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीक है, जिसमें वन्यजीवों को सुरक्षित तरीके से पकड़ने और पुनर्वास के लिए मार्गदर्शन किया जाता है। इस तकनीक में दक्षिण अफ्रीका की विशेषज्ञ संस्था ‘कंजर्वेशन सॉल्यूशंस’ का मार्गदर्शन शामिल है।

इस तकनीक में हेलीकॉप्टर द्वारा मार्गदर्शन, बाड़ों के ज़रिए वन्यजीवों को संकुचित करना और छिपे हुए मचानों से निरीक्षण करना शामिल है। यह पद्धति वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके तनाव को कम करने के लिए प्रभावी सिद्ध हुई है।

रेस्क्यू के बाद पुनर्वास के लिए सुरक्षित स्थानांतरण

अब तक 1,236 से अधिक कृष्णमृगों का रेस्क्यू सफलतापूर्वक किया जा चुका है। इन वन्यजीवों को 11 विशेष ट्रकों के माध्यम से गांधी सागर वन्यजीव अभ्यारण्य, कूनो नेशनल पार्क और वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित किया जा रहा है।

यह पुनर्वास उन्हें सुरक्षित और उपयुक्त आवास प्रदान करता है, जहां वे प्राकृतिक वातावरण में रह सकते हैं। यह स्थानांतरण किसान और वन्यजीवों दोनों के लिए संतुलन बनाता है।

अभियान का उद्देश्य और किसानों पर असर

मालवांचल के राजस्व क्षेत्रों में काले हिरणों और नीलगायों की बढ़ती संख्या से किसानों की फसलों को भारी नुकसान हो रहा था। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को इस नुकसान से राहत दिलाना है।

इसके अलावा, वन्यजीवों का संरक्षण और उनका सुरक्षित आवास सुनिश्चित करना भी इस अभियान का लक्ष्य है। इससे क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष कम होगा और पर्यावरण संतुलन बना रहेगा।

आगे की योजना और अभियान के संभावित प्रभाव

अभियान के दूसरे चरण में कुल 2,000 कृष्णमृगों के स्थानांतरण का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो इसे मध्य प्रदेश के अन्य जिलों और आवश्यकता पड़ने पर अन्य राज्यों में भी लागू किया जाएगा।

इस पहल से वन्यजीव संरक्षण में नए आयाम खुलेंगे और किसानों को भी अपनी फसलों की सुरक्षा का भरोसा मिलेगा। यह संतुलन क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास में सहायक होगा।


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